सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा पर भी तीखी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ वर्गों में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा को लेकर मौखिक रूप से चिंता जताई।

दरअसल, FGM को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई अब सबरीमाला मामले के साथ ही की जाएगी। इसका मुख्य कारण यह है कि संविधान के धार्मिक आजादी से जुड़े (अनुच्छेद 25 और 26) ;जो मुद्दे वर्तमान में 9 जजों की पीठ के विचाराधीन हैं, उनका सीधा प्रभाव इस मामले पर भी पड़ेगा।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रथा महिलाओं के गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है। दूसरी ओर इस प्रथा के समर्थकों का कहना है कि यह उनकी धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है और उन्हें अनुच्छेद 25 के तहत इसे जारी रखने का अधिकार है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि एक तरफ अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता है तो दूसरी तरफ मानवीय गरिमा, स्वास्थ्य और महिलाओं की यौन स्वायत्तता।

FGM का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने बेंच को बताया कि यह प्रथा 7 साल की छोटी बच्चियों पर ;की जाती है और इससे उनके शरीर में ऐसा बदलाव आता है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता, जिसका असर उनकी यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ता है।

उन्होंने दलील दी कि कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर वे इसका पालन नहीं करेंगे तो उन्हें समाज से निकाल दिया जाएगा। लूथरा ने तर्क दिया कि इस प्रथा को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता और इसलिए इसे अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने कहा FGM सेहत के लिए खतरनाक

वहीं, जस्टिस जॉयमाल्य बागची की मौखिक टिप्पणी इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है क्योंकि उन्होंने कहा कि इस प्रथा को रोकने के लिए शायद बहुत जटिल संवैधानिक व्याख्याओं की जरूरत ही न पड़े क्योंकि इस प्रथा पर आर्टिकल 25 के तहत स्वास्थ्य के आधार पर ही रोक लगाई जा सकती है।

जस्टिस बागची ने याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 25, जो धार्मिक स्वतंत्रता देता है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के दायरे में ही मिलेगी।

Source link

Picture Source :